आरक्षण की अति हो जाए तो?

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अगर आरक्षण के कारण सवर्णों के अधिकारों का हनन होने लगे तो क्या हो सकता है?

हाल ही राजस्थान में राजनीतिक और सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में आरक्षण के कई पहलू सामने आए हैं। इससे समाज के कुछ तबके वंचित भी होने लगे हैं, लेकिन संविधान में इसके कुछ रास्ते भी हैं। एक मामला इस प्रकार है।

संविधान के अनुच्छेद 15 (1,2) के  सामान्य नियम का दूसरा अपवाद भी है। खंड 4 में संविधान के पहले संशोधन अधिनियम 1951 के जरिए जोड़ा गया। यह संशोधन काफी रोचक है। यह संशोधन मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दाराईराजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के नतीजे के तौर पर जोड़ा गया। हुआ ये था कि मद्रास सरकार ने एक आदेश देकर प्रदेश के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज में विभिन्न जातियों और समुदायों के छात्रों के लिए स्थान तय कर दिए। ये स्थान धर्म, वर्ण और जाति आधारित थे। आरक्षण से बचा हुआ हिस्सा ब्राह्मणों के लिए रहा, लेकिन हुआ यह कि इन सीटों पर बाकी जातियों, वर्णों और समुदायों के अति प्रतिभाशाली छात्र आ गए। ब्राह्मण छात्रों के लिए सीटें ही नहीं रहीं। ब्राह्मणों ने आपत्ति जताई तो सरकार ने कहा कि यह आदेश न्यायोचित है और इसका मकसद समाज के ज्यादातर वर्गों को सामाजिक न्याय प्रदान करना है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस राजाज्ञा को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

 सुप्रीम कोर्ट का तर्क था यह वर्गीकरण धर्म, जाति और मूल वंश के आधार पर किया गया था, छात्रों की योग्यता पर नहीं। इसके बाद मद्रास प्रदेश में मसले का हल निकाला गया और पुरानी व्यवस्था को बदला गया।

(दैनिक भास्कर से साभार)

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