Thursday, December 30, 2010

तमिलनाडु में ऐसे मिला 69 फीसदी

तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 1993 में एक विधेयक लाकर 69 फीसदी आरक्षण देना शुरू किया था। इस विधेयक के खिलाफ  वर्ष 1994, 95 और 96 में कई याचिकाएं दायर हुर्ईं, जिन पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई 2010 को सुनाया। इस फैसले में कहा गया कि कोई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण संख्यात्मक आंकड़ों के आधार पर ही दे सकता है, लेकिन तमिलनाडु ने ऐसी कोई कवायद नहीं की। इसलिए तमिलनाडु सरकार पिछड़ी जातियों के आंकड़े जुटाकर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के सामने रखे, जिनके आधार पर आयोग आरक्षण तय करेगा। तमिलनाडु ने कोर्ट को सूचित किया कि ऐसे आंकड़े रिपोर्ट के रूप में उपलब्ध हैं। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया कि एम. नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संज्ञान लेते हुए आरक्षण पर पुनर्विचार कर उचित निर्णय ले।
कर्नाटक ने भी 1994 में विधेयक लाकर 66 फीसदी आरक्षण देना शुरू किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसी साल एक अंतरिम आदेश देकर इस रोक लगा दी। गत 13 जुलाई 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश की रोक को साल भर तक बढ़ाते हुए 50' से ज्यादा आरक्षण पर पुनर्विचार करने का आदेश दिया।
क्या है कानूनी प्रावधान
वर्ष 1992 में इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी रहेगी। लेकिन अत्यधिक विशेष परिस्थितियों में अपवाद स्वरूप इससे ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है। वर्ष 2006 में एम. नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जातियों के पिछड़ेपन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता की सुरक्षा को संख्यात्मक आंकड़ों से प्रमाणित करने के बाद ही कोई आरक्षण प्रावधान बनाया जा सकता है।

(दैनिक भास्कर से साभार)

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