Thursday, December 30, 2010

गूर्जरों का अतीत

  • भारत के साथ-साथ पाकिस्तान में भी गुर्जरों की तादाद काफी है। दोनों ही देशों में हिंदू और मुसलमान धर्म मानने वाले गुर्जर हैं। राजस्थान के अलावा भारत के जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिगी और हरियाणा में भी काफी गुर्जर आबादी हैं। 
  • प्राचनी काल में युद्ध कला में निपुण रहे गुर्जर परंपरागत रुप से खेती और पशुपालन से जुड़े रहे हैं। राजपूतों की रियासतों में गुर्जर अच्छे योद्धा माने जाते थे और भारतीय सेना में अभी भी इनकी अच्छी काफी है।
  • इतिहासकारों का मत है कि गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए थे लेकिन इसी वे इन्हीं इलाकों से आए आर्यों से अलग थे। कुछ इतिहासकार इन्हें हूणों का वंशज भी मानने का मत रखते हैं। 
  • छठी सदी के बाद सत्ता पर गुर्जरों का प्रभाव बढ़ा और सात से 12वीं सदी के बीच गुर्जरों ने कई इलाकों में शासन किया। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली मानी जाती है। मिहिरभोज गुर्जर-प्रतिहार वंश के नामी शासकों में माना जाता है जिसका संघर्ष बिहार के पाल वंश और महाराष्ट्र के राष्ट्रकूट शासकों से रहा। 
  • 12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश कई हिस्सों में बंट गया। गुर्जर समुदाय से अलग हुए सोलंकी, प्रतिहार और तोमर जातियां प्रभावशाली हो गईं और राजपूतों के साथ मिलने लगीं। कई गुर्जर कबीलों में बदलने लगे और उन्होंने खेती और और पशुपालन को अपना लिया।
  • मानवशास्त्रियों के अनुसार विभिन्न राज्यों के गूर्जरों के बीच सामाजिक और राजनैतिक स्थितियों में अंतर भी है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले गूजरों की स्थिति थोड़ी अलग है जहां हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों को मानने वाले गूर्जर हैं जबकि राजस्थान में अधिकांश हिंदू गुर्जर है। मध्य प्रदेश के चंबल में गूजर डाकूओं के गिरोह प्रभावशाली रहे हैं। 
  • समाजशास्त्रियों के अनुसार हिंदू वर्ण व्यवस्था में इन्हें क्षत्रिय वर्ग में रखा जा सकता है लेकिन जाति के आधार पर ये राजपूतों से पिछड़े माने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों गूजर घुमंतू जनजाति की श्रेणी में आते हैं।

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