अब 1 प्रतिशत आरक्षण की वैधानिकता पर भी सवाल

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विधि विशेषज्ञों ने कहा कि एक जाति को दो वर्गों में नहीं रखा जा सकता। हाई कोर्ट में मिल सकती है इस आरक्षण को भी चुनौती
जयपुर. राज्य सरकार की ओर से हाल ही गुर्जरों के साथ किए गए समझौते के तहत 50 प्रतिशत विशेष पिछड़ा वर्ग में 1 प्रतिशत आरक्षण की वैधानिकता पर भी सवाल उठने लगे हैं। विधिवेत्ताओं का कहना है कि हाई कोर्ट का निर्णय आने के बाद ही सरकार यह आरक्षण दे सकती थी। इसके लिए भी गुर्जरों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी से अलग करना होगा, क्योंकि एक ही व्यक्ति दो वर्गों में लाभ नहीं ले सकता। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि विशेष पिछड़ा वर्ग में दिए गए 1 प्रतिशत आरक्षण को भी हाई कोर्ट में कभी भी चुनौती मिल सकती है।
इस समझौते को लेकर जहां अन्य पिछड़ा वर्ग में नई बहस छिड़ गई है, वहीं उन्हें यह भी आशंका होने लगी है कि कहीं हाई कोर्ट से आरक्षण अधिनियम 2009 अवैध घोषित होने की स्थिति में ओबीसी के 21 प्रतिशत में से 4 प्रतिशत आरक्षण कम नहीं कर दिया जाए। इसलिए ओबीसी की अन्य जातियां भी लामबंद होने लगी हैं।
संवैधानिक रूप से सही नहीं
आरक्षण के टुकड़े करना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। यदि संविधान की 9वीं अनुसूची में इसे शामिल कर लिया जाए तो हो सकता है कि कुल आरक्षण यानी 50 प्रतिशत से अधिक दिया गया आरक्षण वैधानिक हो।
आर. एस. वर्मा, सेवानिवृत्त न्यायाधीश
पिछड़ों का वर्गीकरण नहीं हो
गुर्जरों को दिए गए 1 और 4 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिकता संदेहास्पद है। संविधान आरक्षण के टुकड़े करने की इजाजत नहीं देता है। पिछड़े और अधिक पिछड़े वर्ग का वर्गीकरण न तो किया गया है और न ही किया जा सकता है। समझौते के तहत यदि आरक्षण दिया जाता है तो यह असंवैधानिक होगा।
ए.के. जैन, एडवोकेट
दो वर्गों में आरक्षण का लाभ गलत
गुर्जरों और 3 अन्य जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग में 1 और अन्य पिछड़ा वर्ग में 4 प्रतिशत का लाभ देना कानूनन सही नहीं है। किसी भी जाति वर्गों को केवल एक ही श्रेणी में आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। गुर्जर और अन्य जातियां आरक्षित वर्ग में भी दोहरा लाभ लेंगी, जो ठीक नहीं है। इसे कोर्ट में चुनौती मिल सकती है।
सागरमल मेहता, पूर्व महाधिवक्ता
एक ही व्यक्ति को दो वर्गों में नहीं 
राज्य सरकार नई श्रेणी बनाकर किसी भी पिछड़े वर्ग को आरक्षण तो दे सकती है, लेकिन एक ही व्यक्ति को दो वर्गों में नहीं रख सकती है। भाजपा सरकार ने जो आरक्षण कानून बनाया था, सरकार उसे संविधान की 9वीं अनुसूची में डलवाए।
कैलाशनाथ भट्ट, पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता
भास्कर से साभार

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